Log Kya Khenge

कह दिया मैने उनसे, 
करुंगी अपने मन की, 
अपने परिवार के मन की, 
क्योंकि नहीं है मुझमे ये रोग 
क्या कहेंगे लोग ।
.
मतलब नही अपने काम से
रखते है नजर हम पर
परवाह नही करती अब उनकी नज़र की मै
क्योंकि नहीं है मुझमे ये रोग 
क्या कहेंगे लोग ।
.
छलकाते है ये आंसु सबकी आंखों से 
शर्म नही किसी की इनको
डरना सीखा नही इसलिए इनसे
मन को सदा दुखाते फिरते है 
पर अब डरती नहीं मै इनके डर से 
क्योंकि नहीं है मुझमे ये रोग 
क्या कहेंगे लोग ।
 .
किसी के पिछे पढ जाये तो जीना करदे हैं मुहाल।
किसी के पिछे पढ जाये तो जीना करदे हैं मुहाल।
रखती नहीं मै दिल पर अब इनकी कोई भी बात
क्योंकि नहीं है मुझमे ये रोग 
क्या कहेंगे लोग ।
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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'What will people say / Log kya kahenge'

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