माशूक़ – Delhi Poetry Slam

माशूक़

By Sneh Jyoti Chaprana

मेरे दोस्त मेरी ग़ज़ल के लिए भी
एक ग़ज़ल कह दो
वो पढ़ती रहे उसे और मैं जी जाऊ
ऐसा एक लम्हा मेरी नजर कर दो
मैंने भी कुछ इस क़दर इरशाद कहा
तुम ही हो जो उस पर मरते हो
अपने बाप की तमाम दौलत
उस पर खर्च करते हो
उसे रानी बना खुद
फ़कीरो सा सफर करते हो
कुछ नही है अब पास तेरे यें बात
उससे भी तो कह कर देखो
कहीं अपने दिल से ना निकाल दे
उससे पहले उसके बाप के
दामाद बनकर तो देखो
ये बात सुन वो मुझ पर गुराया
क्या तुम लड़की के कुछ लगते हो
क्यों मेरी ज़िंदगी तबाह करते हो
उसे रानी बना हम फ़क़ीर ही अच्छे
उसके प्यार की शफ़क़त तले
हम माशूक़ ही सच्चे ।


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