ये दुनियाँ... – Delhi Poetry Slam

ये दुनियाँ...

By Jyoti Sharma

ये दुनियाँ….

ये दुनियाँ इतनी नकली क्यों हैं...

ये दुनियाँ इतनी मतलबी क्यों हैं....

इस दुनियाँ मे यह सब बनावट क्यों हैं...

आगे बढ़ना दुसरो के लिए रुकावट क्यों हैं...

मुझमे इस बनावट का हिस्सा क्यों हैं...

कोई अधूरा किस्सा क्यों हैं...

सबके सामने झुकना कमज़ोरी क्यों हैं...

दुसरो को गिराना ज़रूरी क्यों हैं...

बिना मेहनत के थकान क्यों है...

बिना पंखो के उड़ान क्यों हैं...

सबका दर्द मज़ाक क्यों हैं...

बिना पैसे सब ख़ाक क्यों हैं...

नींद से ज़्यादा सपने क्यों हैं...

बिना प्यार के अपने क्यों हैं...

सबका दिल इतना मैला क्यों हैं...

हर कोई यहाँ अकेला क्यों हैं...

सच की जगह झूठ क्यों हैं...

अच्छाई सिर्फ दो घूँट क्यों हैं...

अब अच्छाई इतनी बदनाम क्यों हैं...

सच्चाई देख के सब हैरान क्यों हैं...

एक इंसान के दस चेहरे क्यों हैं...

कुछ के दर्द इतने गहरे क्यों हैं...

सबकी आँखों मे पानी क्यों हैं...

सबकी अधूरी कहानी क्यों हैं...

ये दुनियाँ इतनी नकली क्यों हैं...

ये दुनियाँ इतनी मतलबी क्यों हैं…


1 comment

  • This poem reflects deep philosophical and existential questions about the nature of the world and human behavior. The poet expresses a sense of disillusionment with the world, describing it as “fake” and “selfish.” The poem touches on themes of deception, artificiality, and the obstacles that people face, including how one’s authenticity is compromised by external pressures.

    Jaymala Varshney

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