डर

By Palak Manglik

डर का रूप अनोखा है
कभी ख़ामोश करता है कभी चहरे से बयां होता है
कोई जज़्बातों को ज़ुबान पे लाने से डरता है तो कोई महफ़िल में कद्रदानों की हँसी का खौफ रखता है
डर इस कदर हावी हो जाता है कि मनुष्य ख़ुद से नज़रे चुराने लगता है
तालियों का शोर नहीं हंसी की आवाज़ का डर बैठा कर अपने सपनों को दबा देता है
डर एक रोग है जिसकी ख़ुद डर है
हिम्मत करने से खौफ को मात देते है कुछ तो कुछ डर को अपनी कमजोरी समझ के दबते रहते है तमाम उम्र
किसी का खौफ बड़ा होता है तो किसी का छोटा
चाहे वो ऊंचाई का हो या तालाब में जाने का हो
मन का विचित्र डर खुदको ज़ुबान पे लाना है
तो दिल का अपने मोहब्बत का इज़हार करना
कठोर इंसान भी कोई डर छुपाकर घूमता है तो कोमल इंसान किसीको समझाने से डरता है
सोचो तो डर ताकत बन सकता है तुम्हें कलम के ज़रिए इज़हार ए दिल बहतरीन बयान करा सकता है
ज़ुबान ना बोले कुछ तो पन्ने दास्तान बयां कराता है ये डर
कुछ लेखक मेरी तरह डर से हार के अपने जज़्बात कलम के ज़रिए शोर मचाते है तो कुछ आज भी डर के मायाजाल में फंसे है II


9 comments

  • Bohot accha h. Sachme darr ke bohot rup hote h…. Keep it up.. keep going..

    Subhasree
  • Well expressed!! ??

    Vidhi
  • शानदार कविता पलक,
    ऐसे ही लिखते रहो
    और लोगों को अपने
    शब्दों का दीवाना बनाते जाओ ।
    ?????

    Sheel Sindhu
  • Well penned thought

    Madhur
  • Wow!! This definition of fear is amazing!! Socha nhi tha aisa darr..

    Soni
  • Awesome thought.
    Very nicely explained the fear

    Aashish Kumar
  • Woah☺️ darr ki ye describtion!! ?? its amazing….

    Navkiran Kaur
  • Darrrrr…..
    Kabhi kabar ye dar hi jindegi ek alag panna (page) ban jata hai…
    Aacha hai…

    Shilpam
  • Awesome!!!

    Roohi Bhargava

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