पंछी होती तो, अंबर छू लेती

By Yashika Mishra

 

संसार में कहने को एक बोझ हूँ

लेकिन उस बोझ में भी सबसे बड़ा धन हूँ।।
धीरे-धीरे उड़ना चाहती हूँ
तानों के डर से,
जमीन पर भी रहना चाहती हूँ।।
बंदिशों में जकड़ी मैं
प्यालों के बीच दबी मैं 
मोह-माया के जाल में फंसी मैं
आसमान में उड़ने के लिए लड़ी मैं।।
सवाल आया तो आया,
ख्वाब कैसे पूरे हो ?
नभ में ऊँची उडा़न के अरमान कैसे पूरे हो?
एक  परिंदा होती, दिन भर बिचरा (घूमा)करती 
जहांँ मन करता, वहांँ जाती 
जो मन करता, वो करती 
रोज अपने नए ख्वाबों को बुनती।।
तरू की फुनगी(डाली) पर झूलती
ख्वाबों के आश्रय में रहती।।
तेज गति से ,दूर लंबी उडा़न भरती 
पंखों की होडा़-होडी़ करती।।
इस ख्वाब में बस यही इक ख्वाब देखती मैं
पंछी होती तो अंबर छू लेती मैं।।
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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'My Superpower'

2 comments

  • Lovely

    Vinita Upadhyay
  • Very nice

    Anup

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