इश्क़ से जो बैर मेरा

शाश्वत दिगंबर जैन

 

तेरी ख़ुशबू के परिंदें, बैठे हैं कईं डालियों पर,

 

तेरे हुस्न के इसी जुर्म का, दीवान बन जाता हूँ मैं।

 

जो करने तसलीम नज़राना, तेरी आँखों का ये आँखें,

ग़ज़ल पलकों तक लाती नहीं, गुमान बन जाता हूँ मैं।

 

गर चुराकर इस जहाँ से, रख लूँ तेरा इक नज़ारा,

मेरे ही दिल का उसी पर, अहसान बन जाता हूँ मैं।

 

ज़माने भर के शोर में जब, गूँजता चेहरा है तेरा,

चुप्पियों की आँधियों में ,कोहराम बन जाता हूँ मैं।

 

इश्क़ से जो बैर मेरा, रश्क़ इतना भर मुझे है,

सफ़र शुरू होता नहीं, अंजाम बन जाता हूँ मैं।


1 comment

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    Anirudh Krishna

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