मेरे शहर की आवाज

By Sankita Agrawal

चाहे कोई भी गली हो
या कोई भी चौराहा 
हर जगह गोपी के पीछे 
कन्हैया की परछाई मिलती है, 
कभी सुबह तो कभी शाम को 
यमुना के तट पर बैठ जाओ
ऑंखों में निर्मल लहर सी दौड़ती है 
सूरज की किरणें उन लहरों में 
नारंगी रोशनी बिखेरती है, 
गोर्वधन हो या वृन्दावन
दोनों का एक ही संगम
गिरिराज धरण हो या कृष्णा 
भक्ति ही हर जगह मिलती है, 
जन्मभूमि में कदम रखकर 
पैर की मिट्टी भी पवित्र हो जाती है
कृष्णा की भक्ति में रमी 
मीरा भी वृन्दावन खिंची चली आती है, 
चाहे वो द्वारिकाधीश के दर्शन हो
या बॉंके-बिहारी की महिमा 
रमणरेती की भक्तिमय धूल हो 
या प्रेम-मंदिर की सुंदरता
हर परदेसी का मन मोह लेती है, 
जब भक्ति से मन भर जाये 
और पेट पूजा का ध्यान आये
चाहो तो पेड़ा खा लो
या चाट का कटोरा
बृजवासी की मिठाई खा लो 
या उसका ढोकला,
मेरे शहर में कृष्णा है
राधा है, मीरा है
हर धर्म का इंसान है
पर आवाज एक ही गूँजती है
" जय कृष्णा ", 
" जय राधा "
इस कविता को पढ़कर 
कभी दिल करे तो 
मथुरा चले आना ।। 

2 comments

  • This is just so beautifully written… Loved it so much ❤😍

    Ankita Maji
  • Amazingly described the magnanimity of Mathura. Loved it ❤️

    Varsha Mishra

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