मिट्टी को ढूंढता हूँ

By Subrata Nayak

पाँचवीं में था मैं उस वक़्त

जब अपने गाँव में रहता था,

खेतों के बीच से दौड़ लगा कर

अपनी पाठशाला जाता था।।

 

पापा फौज़ में थे, तो हमें ननिहाल छोड़ गए थे

नाना नानी, मामा मामी के संग हम रहते थे,

नाना हमारे बड़े जमींदार, मामा हमारे वैद थे

खुशियाँ थी आसमान सी, ग़म सारे कैद थे।।

 

लिखते लिखते याद आ गयी, एक बूढ़े दादू की,

उनके घर के आँगन में थी, एक बड़ी पेड़ बेर की,

उस पेड़ से बेर तोड़ कर खूब हम खाते थे

जब भी हमें देखते थे दादू, छड़ी उठा भगाते थे।।

 

गाँव में उस वक़्त बिजली न था,

न पाठशाला में कुर्सी-मेज़ था,

जीवन का मानो अमूल्य ज्ञान,

ज़मीन पे बैठ कर सीखा था॥  

 

छुट्टियों के दिन हम गाय चराने जाते थे

नारियल के पत्तों को मोड़, बांसुरी हम बनाते थे,

बबूल के पत्तों में नमक मिलाकर, बड़े चाव से खाते थे,

कटी डोर की गिरती पतंग पे, खूब दौड़ लगाते थे॥

 

गाँव मैं अब भी जाता हूँ,

काली पक्की सड़कों में, अपनी मिट्टी को ढूंढता हूँ,

पाठशाला अब बड़ा बनकर, पक्का बन गया है,

नयी मेज़-कुर्सी के नीचे, वो ज़मीन दब गया है॥


                                     

Subrata Kumar Nayak
M.A., M.Phil. in English Literature
TGT (English)
Delhi Public School
Farakka

1 comment

  • बहुत ही बढ़िया

    Abhishek Patel

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