एक मका़न

By Akhilesh Sharma

वो जो मकान है, आजकल उदास सा रहता है
उसे ग़म है शायद, कि उसकी इन बोसीदा सी दीवारों में 
कभी एक घर भी हुआ करता था 
चहल-पहल रहा करती थी जिसमें साल-दर-साल 
दीवारें उसी मका़न की अब बारिश में रोती हैं 
खेला करते थे जहां, वो छोटा सा जो बरामदा 
अब सुनसान खड़ा, भीगता रहता है 
जिसकी दहलीज़ पर कदमों के निशान कुछ 
ऎसे जमा रहते थे, जैसे घर के ही बाशिन्दे हों
अब मक़ान की उसी चौखट पर काई जम गई है, 
इसके रहने वाले तो कब के जा चुके हैं, पर
लगता है वक़्त उस घर का, यहीं आकर ठेहर जाता है
इसकी ज़मीन पर, छत पर, टूटती सी दीवारों पर,
अब कुछ झाड़ियां, कुछ पत्तों ने, कब्ज़ा जमा रख्खा है
उस मक़ान कोभीअब, वही इसके रहनेवाले लगते हैं
ऐसा तो नहीं कि भूल चुके हैं इसके पुराने रहने वाले
अब भी आ जातें है मिलने साल में एक बार तो
पूछने हाल इस बूढ़े मका़न का, 
और थोड़ी देखभाल भी करते हैं, 
पर ये मक़ान, लगता है 
भूल गया है इन चहरों को, उसे अब ये लोग
अजनबी कोई, मेहमां लगते हैं, थोड़ी देर के ही
कहता होगा शायद वो बूढ़ा मक़ान इनसे 
"अभी तो आए थे, अभी जा रहे हो,
फिर यूं ही अकेला छोड़ कर जा रहे हो,
उम्र हो चली है अब मेरी, 
और कितना इंतजार कराओगे?
बताओ, मुझे एक मक़ान से एक घर, 
फिरसे कब बनाओगे?"
वो जो मकान है, आजकल उदास सा रहता है
वो बूढ़ा मका़न है जो, जम्मू में ।। 

2 comments

  • Brilliant

    Neelam Agarwal
  • उम्र हो चली है अब मेरी,
    और कितना इंतजार कराओगे?
    बताओ, मुझे एक मक़ान से एक घर,
    फिरसे कब बनाओगे?"

    बहुत ही बढ़िया

    Abhishek Patel

Leave a comment